बिलासपुर / रामचरित मानस को सभी अपने - अपने जीवन में अपनाएँ, उसके आचरण को जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए। रामचरित मानस में 14 कांड हैं, इनमें मानस की हर चौपाई मंत्र है। चौपाइयों में भगवान राम का नाम है। रामचरित मानस के हर प्रसंग हर किसी के लिये प्रेरणादायी हैं।
संत श्री विजय कौशल जी महाराज की रामकथा में आज श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी थी। लाल बहादुर शास्त्री स्कूल के मैदान में आयोजित कथा के छठे दिन उन्होंने भगवान राम के चित्रकूट आगमन का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि वहाँ के सरल, सहज व सहृदय वनवासियों को देखकर वे प्रसन्नता से भर उठे।
उन्होंने इन भोले आदिवासियों के भरपूर स्वागत की बात कही। संत श्री ने कहा कि भगवान जब अयोध्या छोड़कर आए, तब अयोध्या नगरी शोक में डूब गई। चारों ओर लोगों के मन में व्याकुलता बनी रही। वहाँ के लोग अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान को याद करते रहे। चारों ओर अंधकार छाया रहता। राजा दशरथ जी को सुमंत जी से राम के वनगमन की जानकारी मिली, वैसे ही असहाय व दयनीय होकर गिरने लगे और एक खंभे को पकड़ लिया। माता कौशल्या उन्हें इस हालत में देखकर कहने लगीं—आपने ही मेरी मांग में सिंदूर भरा था, मेरी मांग को देखिए। राजा दशरथ श्री अंतरमन से दुखी होकर विलाप कर रहे थे। बार-बार भगवान राम को वापस अयोध्या बुलाने को कह रहे थे। महाराज की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। उन्हें हाथ में लाठी लिए श्रवण कुमार के माता-पिता दिखाई देने लगे। कौशल्या जी उन्हें बताती हैं कि यहाँ लाठी लिए कोई खड़ा नहीं है। संत जी ने आज माता कौशल्या से श्रवण कुमार के माता-पिता की कहानी बताई। उन्होंने कहा कि मैंने अनजाने में ही आवाज सुनकर शब्दभेदी बाण चला दिया। श्रवण कुमार के माता-पिता अंधे थे। ज्योतिषियों ने उन्हें बताया था कि अपने वृद्ध माता-पिता को तीर्थ यात्रा कराओगे तो उनकी नेत्र ज्योति फिर वापस आ जाएगी। बाण लगने के पश्चात जब राजा दशरथ श्रवण कुमार के पास गए और अपनी इस गलती के लिए क्षमा माँगी, तो श्रवण कुमार ने उनसे कहा कि उनके वृद्ध माता-पिता कुछ दूरी पर बैठे हैं। आप जाकर पहले उन्हें जल पिलाना, वे पानी का इंतजार कर रहे हैं, और घटना की जानकारी दे देना। राजा दशरथ जब उनके पास पहुँचे, तो पहले उन्हें जल पिलाया। दोनों वृद्ध माता-पिता उन्हें श्रवण कुमार समझ रहे थे। पानी पिलाने के पश्चात जब महाराज ने सच्ची बात बताई, तो श्रवण के वृद्ध माता-पिता ने उन्हें पुत्र वियोग में ही उन्हीं प्राणांत होने का श्राप दे दिया। उन्होंने कहा—मैं पापी हूँ, मेरे बाण से गलतफहमी की वजह से श्रवण कुमार की मृत्यु हो गई। दशरथ जी यह कहानी सुना कर माता कौशल्या की गोद में अपना सिर रख दिया और फिर सिर एक ओर लुढ़क गया। वशिष्ठ जी महाराज वहाँ पहुँच गए और माता कौशल्या को ढाढ़स बँधाने लगे। उन्होंने कहा कि आपके ऊपर अयोध्या का बोझ है, आप शांत रहें, विलाप न करें। महाराज दशरथ जी का रात में प्राणांत होने पर भरत जी ने भयंकर सपना देखा और चिंता व भय से अचानक उछल पड़े।
ब्राह्मणों को बुलाकर उन्होंने अभिषेक कराया, ब्राह्मणों को भोजन कराया। दूसरे दिन ननिहाल से अयोध्या पहुँच गए। लोग रो रहे थे। उन्हें देखकर रोने का कारण पूछा तो किसी ने कुछ नहीं बताया और बोले—आपको बहुत दिन बाद देखे हैं, इसलिए कैसे रो रहे हैं। अयोध्या में आज कैकेयी और मंथरा दोनों ही खुश थीं। कैकेयी जी ने जब उन्हें राजपाट सँभालने के लिये कहा, तो वे विलाप करने लगे। उन्होंने कहा कि मेरे कारण मेरे प्रभु का बनवास हो गया और दशरथ जी का प्राणांत हो गया। क्रोध से उन्होंने कैकेयी को उप-अनाप-शनाप बोलने लगे। बोले—मैं आज से तुम्हारा बेटा नहीं, मेरा रामदोह से कोई वास्ता नहीं रखता। इसके बाद भरत जी ने कभी कैकेयी जी को माता नहीं कहा। दशरथ जी का पार्थिव देखकर विलाप करने लगे। वशिष्ठ जी के आने पर उन्होंने विधि-विधान से भरत जी के हाथों दशरथ जी का अंतिम संस्कार कराया। वशिष्ठ जी ने जब भरत जी से राजकाज सँभालने को कहा, तो उन्होंने कहा कि क्या आप लोगों ने मेरे पिताजी की आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया है। पहले मुझे ननिहाल से बुलाकर राज्याभिषेक किया जाता, तब मैं देखता कि मेरे प्रभु राम को कैसे वन जाना पड़ता। वशिष्ठ जी भरत जी के तर्क के आगे नतमस्तक हो गए। संत श्री विजय कौशल महाराज ने राम–भरत प्रेम का उल्लेख करते हुए कहा कि भरत जी इसके बाद चित्रकूट जाने के लिए रथ, पालकी आदि तैयार कर जाने लगे। अयोध्यावासी भी अपने साधनों से चित्रकूट पहुँच गए। भरत जी ने रास्ते में जब देखा कि भगवान यहाँ से पैदल गए हैं, तो वे भी अपने वाहन से उतरकर पैदल चलने लगे। उनके पैरों में छाले पड़ गए थे। वे पहले भारद्वाज ऋषि के आश्रम पहुँचे। भरत जी चित्रकूट पहुँचकर भगवान राम, सीता और लक्ष्मण जी के कुटीर में पहुँचे और सबसे पीछे खड़े हो गए। माता कौशल्या ने कहा कि राम, लक्ष्मण और शत्रुघ्न बेटे हैं, किंतु भरत हमारे कुल का दीपक है। वे रघुवंश को कृपा प्रदान करने आए हैं। भरत बंधु नहीं, सुबंधु हैं। भगवान राम ने भरत जी से कहा—पिताजी की एक इच्छा मैं पूरी कर रहा हूँ, दूसरी इच्छा तुम पूरी कर दो। महाराज जी ने बताया कि भगवान राम एक दिन सीता जी को लाए गए फूल से शृंगार कर रहे थे। तब इंद्र जी का वाहन कौआ बनकर सीता जी के पैर में अपनी चोंच मार दी। पैर से खून बहने लगा। भगवान राम ने जब यह देखा तो तुरंत वहाँ रखी घास से धनुष और बाण बनाकर उस पर छोड़ दिया। तब वह सभी देवों के पास गया, लेकिन उसे कहीं भी शरण नहीं मिली। तब नारद जी ने उसे समझाया कि तुम प्रभु राम के पास ही जाओ और कहो कि पहले प्रभाव देखने आया था, अब स्वभाव देखने आया हूँ। वही तुम्हें क्षमा कर सकते हैं। एक दिन नारद जी विचरण करते हुए लक्ष्मी, रुक्मिणी और ब्रह्माणी जी के पास पहुँच गए और अहिल्या जी के उत्तम पतिव्रता धर्म की प्रशंसा कर दी। इस पर शंकर, ब्रह्मा और विष्णु जी उनकी परीक्षा लेने पहुँच गए। उन्होंने माता अहिल्या से भिक्षा माँगी, पर उन्होंने उनसे भिक्षा नहीं ली। बोले—हम आपका दूध पिएंगे। अहिल्या जी दुविधा में पड़ गईं। उन्होंने अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए तीनों को छोटा बालक बनाकर दूध पिलाया। खबर मिलने पर लक्ष्मी, ब्रह्माणी और रुद्राणी अहिल्या जी के पास पहुँचकर माफी माँगने लगीं। इस पर उन्होंने क्षमा कर उन्हें उनके मूल स्वरूप में लौटा दिया। उन्होंने बताया कि अगस्त्य ऋषि के आश्रम में एक छोटा बालक था, जो रोज भगवान शालिग्राम की पूजा करता था। वह गोदावरी तट पर जाता। एक दिन वहाँ पके जामुन को देखकर वह भगवान शालिग्राम को फेंककर जामुन तोड़ने लगा। तब शालिग्राम जी नदी में चले गए। जब वह नदी में खोजने गया तो जामुन हाथ लगा, जो शालिग्राम की तरह दिखता था।
दूसरे दिन अगस्त्य ऋषि उसी शालिग्राम को लेकर पूजा करने गए। तब नदी के जल में जामुन की गुठली अलग हो गई। ऋषि ने शिष्य को डाँटा। दूसरे दिन वह फिर नदी जाकर भगवान की पूजा किया और उन्हें साक्षात् प्रगट होने का निवेदन किया। भगवान प्रगट हुए तो उन्हें प्रणाम कर आश्रम चलने का अनुरोध किया। आश्रम में साक्षात भगवान को देखकर ऋषि प्रसन्न हो गए। भगवान राम की कथा का वर्णन करते हुए कहा की माता सीता सोने के मृग की लालसा प्रगट की। लक्ष्मण जी राम जी के जाने पर लक्ष्मण रेखा खींचकर गए थे। बाद में भगवान राम को दो होते देख वे लक्ष्मण रेखा खींचकर चले गए, किंतु माता सीता ने इस लक्ष्मण रेखा को पार कर मर्यादा का उल्लंघन किया। सीता जी की खोज में भगवान दंडकारण्य चले गए। माता शबरी की कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि शबरी राज परिवार की थीं, किंतु अगले जन्म में वह शबर भील के यहाँ जन्म लीं। जब उसने अपनी माँ से इतने अधिक जानवरों की उपस्थिति घर में देखी तो माँ ने बताया कि तुम्हारी शादी में इन्हें खाने के लिए परोसा जाएगा। इससे दुखी होकर वह घर छोड़कर भाग गई। वहीं दंडकारण्य के किनारे आकर रहने लगी। वह संतों के आश्रम के पास पहुँचकर देखती थी कि संतों के आने-जाने के मार्ग में काँटे बिखरे हुए हैं। वह रोज रास्ता साफ कर देती थी। एक दिन वह देर से सफाई कर सो गई और जब उठी तो संतों ने उसे देख कर पूछा और उसे अछूत समझकर दुर्व्यवहार करने लगे। मतंग मुनि ने साधुओं को समझाया कि इसने तो तुम्हारे मार्ग निष्कंटक किए हैं। साधु उल्टे नाराज होकर पंच सरोवर में पुनः स्नान करने चले गए। तब उन्होंने देखा कि सरोवर में कीड़े बिलबिला रहे थे।एक दिन शबरी घर में पूजा कर रही थी, तभी भगवान उसके घर पहुँचकर दरवाजा खटखटा रहे थे।
आज पूरा पंडाल राममय हो गया था। बूढ़े, युवा, युवतियाँ, महिलाएँ भी—
“मेरी झोपड़ी के भाग खुल जाएंगे, राम आएंगे, राम आएंगे”
आदि गीतों पर थिरक रहे थे।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में मुख्य संरक्षक श्री अमर अग्रवाल , श्रीमती शशि अग्रवाल, महेश अग्रवाल , गुलशन ऋषि, गोपाल शर्मा,युगल शर्मा , कश्यप कछवाहा काछी समाज ,मैढ़ क्षत्रिय मारवाड़ी सोनी समाज , मौर्या कुशवाहा समाज ,उद्यान मित्र मंडली ,देशहा रजक समाज, दाउदी बोहरा समाज , मांग समाज , जैन सभा बिलासपुर , महाराट्र मंडल ,रेलवे महाराष्ट्र मंडल , हैहैयवंशीय क्षत्रिय ताम्रकार समाज , अग्रहरि वैश्य समाज , कान्य कुब्ज हलवाई समाज ने स्वागत किया कार्यक्रम के अंत में श्री अमर अग्रवाल , श्रीमती शशि अग्रवाल आदि गणमान्यजन आरती में शामिल रहे।
=============
संवाद केंद्र
लाला भाभा
मोबाइल नं- 9827986130
कार्यालय श्री अमर अग्रवाल
राजेन्द्र नगर बिलासपुर
बिलासपुर (छ ग)
Social Plugin