माघ मास भगवान की कथा श्रवण पूजन करने का अति उत्तम समय है, प्रयागराज में गंगा तट पर हजारो साधु संतो और गृहस्थ डेरा जमा कर वहां कथा श्रवण पूजन कर अपने मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते है यह राम कथा इस पावन मास में आप लोगो के पास स्वयं चल कर आयी है। यह कथा समस्त लोको को पावन करने गंगा रूपी मोक्षदायिनी है। मोक्ष प्राप्ति का अटल उपाय कथा श्रवण करना है।
उक्ताशय के उदगार आज यहां लाल बहादुर शास्त्री स्कूल के भव्य पंडाल में संत प्रवर श्री विजय कौशल जी, महाराज ने हजारो की संख्या में उपस्थित श्रद्धालुजनों के मध्य व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि जहां कहीं भी भगवान की कथा होती है, वहां सारे तीर्थ आकर निवास करतें हैं और स्वयं भगवान भी जिनकी कथा होती है आकर विराजमान रहते हैं। उन्होंने इस संदर्भ में आगे कहा कि भगवान स्वयं कहते है कि जहां मेरे भक्त कथा सुनते है वहां मैं स्वर्य विराजमान रहता हूँ।
उन्होंने कहा कि आप सभी लोग जहां - जहां जब भी समय मिल जाये तब कथा अवश्य श्रवण कर लें कथा श्रवण करने में ही भगवान् के दर्शन होते है और समस्त इच्छाएं पूर्ण होती है। योग यज्ञ एवं जप, तप भगवान के वश की बात नहीं है। तथा अपने जीवन में जीतना अधिक समय हो भगवान की कथा अवश्य सुनिए। यह जिसमें भगवत प्राप्ति निश्चित है। माता पार्वती ने इसे सिट्ट किया है, इसलिए माताएं पार्वती की तरह होने का आर्शीवाद बेटियों को प्रदान करती है, न कि रुकमणि और सीता की तरह होने का,संत जी ने आगे कहा कि माता पार्वती भगवान शंकर के प्रसन्न स्थिति होने का इंतजार करती रही। जब उन्होंने शंकर जी को प्रसन्न मुद्रा में चुटकी बजाते देख लिया तो मौके का फायदा उठाते हुए उनसे कुछ बात पूछने का आग्रह किया । माता पार्वती ने कहा भगवन राम ब्रम्ह कैसे हो सकते हैं और निर्गुण- सगुण कैसे हो गये। भगवान और राम कृष्ण का और कृष्ण का जीवन रोते-रोते बीता इसका मर्म सुनाइए। इस पर भगवान शंकर ने प्रसन्न होते हुए कहा कि पार्वती जी आप धन्य हैं लेकिन आप निर्गुण सगुण के चक्कर में मत पड़िये । आप जगत के कल्याण के लिए
रामकथा प्रकट करना चाहती है। भगवान की मूर्तियों को लेकर कई प्रकार की आलोचनाओं करने वाले पाखंडियो से आप लोगो को दूर रहना चाहिए। भगवान न तो निर्गुण होते हैं न सगुण महाराज जी ने कहा कि भगवान केवल दो बातों में परतंत्र होते हैं। एक तो वे अपना रूप नहीं बना सकते और ना ही अपना नाम रख सकतें हैं। उन्होंने कहा कि वृंदावन में भगवान श्री कृष्ण की हजारों मंदिर स्थापित है जो विभिन्न नामों से जानी जाती है। उन्होंने कहा कि भगवान खोजे नहीं जाते पुकारे जाते हैं। भगवान पुकारने पर ही मिलते है जिन्हें भी भगवान मिले हैं पुकारने पर मिले हैं। चीरहरण के समय द्रौपदी जी की रक्षा करने कोई नहीं आया लेकिन जब उन्होंने भगवान द्वारकाधीश को पुकारा तत्काल द्रौपदी की रक्षा करने पहुंच गये। महाराज ने कहा कि पद और मद हो सगे भाई है । धन का मद व्यक्ति को अंधा बना देता है और पद का अहंकार व्यक्ति को बहरा बना देता है। महाराज जी ने सुमधुर भजनों रामचरित मानस की चौपाइयों के सरल शब्दो में दृष्टांत प्रस्तुत करते हुए अनेक रोचक कहानियों का वर्णन भी किया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में मंच पर सम्मान महाराज जी का मुख्य संरक्षक सर्वश्री अमर अग्रवाल, श्रीमती शशि अग्रवाल श्री सजन अग्रवाल अध्यक्ष महेश अग्रवाल उपाध्यक्ष मोतीलाल सुलतानिया, संयोजक गुलशन ऋषि, श्रीमती रजनी गुलशन ऋषि, किशन बुधिया सहित विभिन्न समाज
प्रमुखों सूर्यवंशी समाज ,खण्डेलवाल समाज, खटीक समाज , कन्नौजे रजक समाज , बैसवारा रजक समाज , स्वर्णकार समाज, चन्द्रपुरिहा कसौंधन वैश्य समाज, राजपूत क्षत्रिय महासभा, नवयुवक कान्य कुब्ज ब्राम्हण समाज आदि ने स्वागत किया। अंत में मंच पर आरती के दौरान मुख्य संरक्षक सर्वश्री अमर अग्रवाल, श्रीमती शशि अग्रवाल श्री सजन अग्रवाल ,केंद्रीय राज्यमंत्री श्री तोखन साहू,विधायक सुशांत शुक्ला ,महपौर पूजा विधानी ,बृजमोहन अग्रवाल, सुनील गुप्ता आदि उपस्थित रहे।
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