बिलासपुर/ इस कलिकाल में तपस्या, साधना की जरूरत नहीं है, केवल भगवान के नाम का स्मरण करें। लोग नाम की महिमा नहीं जानते। प्रभु के नामों का स्मरण करते रहें, आप
भवसागर पार कर लेंगे। कलियुग केवल नाम आधार है। कई भगवानों के हजारों नाम हैं, लेकिन आप एक नाम का सदैव स्मरण करते रहें। राम कथा का 8वां दिन आज अंतिम दिवस था। आज कथा प्रातः 10 बजे प्रारंभ हुई। कथा में आज भी हजारों लोगों की भीड़ रही। सुप्रसिद्ध कथावाचक संत श्री विजय कौशल जी महाराज ने श्रद्धालुओं से उक्त बातें कही। उन्होंने भगवान राम के चरित्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि जब यह निश्चय हो गया कि रावण से युद्ध होना है, तो उन्होंने अपनी सेना को तैयार रहने को कहा। प्रभु श्रीराम ने युद्ध से पहले अंगद जी को रावण के पास समझौते के लिये भेजा। (रावण, अंगद के पिता बालि का मित्र रहा है।) अंगद जी ने रावण को हर प्रकार से समझाइश दी, किंतु वह नहीं माना। रावण ने अंगद को सभा से बाहर करने का आदेश दिया। तब अंगद जी ने सभी को ललकार कर कहा— तुम लोग यदि इतने
शक्तिशाली हो तो मेरा एक पैर हिला कर देखो। रावण की आज्ञा पाकर उसके सभी दूतों ने पैर हिलाने की कोशिश की, फिर भी पैर को कोई नहीं हिला पाया। अंत में रावण सिंहासन से उठकर स्वयं पैर हिलाने की कोशिश करता है, तब अंगद जी उनसे बोलते हैं कि मेरा चरण मत पकड़ो, जाकर प्रभु श्रीराम का चरण पकड़कर माफी मांगो, किंतु रावण नहीं माना। अंगद जी भगवान श्रीराम की शिविर में पहुँचे और उन्हें पूरी घटना की जानकारी दी। इसके पश्चात भगवान श्रीराम अपनी सेनाओं के साथ श्रीलंका जाने को निकल गए। संत श्री ने बताया कि राम जी जब लंका जाने समुद्र के पास रामेश्वरम पहुँचे, जहाँ उन्होंने धनुष-बाण चलाकर समुद्र को सुखाना चाहा। समुद्र में हड़बड़ाहट मच गई। तब समुद्र ने उन्हें सलाह दी कि आपकी सेना में नल और नील हैं, उन्हें समुद्र में पत्थर डालने को कहें। वे समुद्र में पत्थर डालेंगे तो पानी में डूबेंगे नहीं। फिर नल और नील समुद्र में पत्थर डालने लगे। हनुमान जी पत्थरों पर श्रीराम लिखते रहे। प्रभु श्रीराम दूर एक किनारे आकर पत्थर को समुद्र में डालने लगे। तब उन्होंने देखा कि सभी पत्थर डूब जा रहे हैं। हनुमान जी दूर खड़े होकर यह दृश्य देख रहे थे। उन्होंने कहा— प्रभु, महत्व नाम का होता है। इसी बीच प्रभु श्रीराम ने सागर के तट पर
भगवान शंकर की स्थापना शिवलिंग के रूप में की। शंकर जी राम के गुरु थे, वहीं दूसरी ओर रावण के भी गुरु थे। शिवलिंग की स्थापना के बाद भगवान श्रीराम ने पूजा-पाठ किया और श्रीलंका के लिये प्रस्थान कर गए। इस दौरान कुछ लोग आकाश मार्ग से चले गए। सेतुबंध पहुँचकर भगवान श्रीराम ने 400 कोस समुद्र की यात्रा तय कर लंका पहुँच गए। अंगद जी जब रावण के पास गए थे, तो उन्होंने रावण से कहा— जब तुम्हें जानकी जी प्रिय लगती थीं, तब तुम स्वयंवर के समय पहुँच जाते और धनुष तोड़कर उन्हें ले आते। इस पर रावण ने कहा— मैं वहाँ गया था, किंतु धनुष भगवान शंकर का था, यह जानकर मैं वापस लौट गया। मेरे गुरु के धनुष को मैं कैसे तोड़ता। युद्ध में बताया गया कि श्रीराम की सेना के लंका में प्रवेश करते ही युद्ध प्रारंभ हो गया। रावण ने पहले मेघनाथ को युद्ध के लिये भेजा। मेघनाथ ने दिव्य शक्ति का
उपयोग कर लक्ष्मण जी को घायल कर दिया। हनुमान जी तत्काल वैद्य सुषेण को उनके घर सहित उठा कर ले आए। वैद्य सुषेण ने कहा कि द्रोणागिरी पर्वत में संजीवनी बूटी है। लक्ष्मण जी को सूर्योदय के पूर्व उसे तीन बार सूँघाना पड़ेगा। कथा प्रसंग में बताया गया कि हनुमान जी बूटी को नहीं पहचानते थे, इसलिए उन्होंने पूरा पर्वत ही उठा लाया। रास्ते में अयोध्या से गुजरते वक्त भरत जी ने उन्हें राक्षस समझकर बाण चला दिया। हनुमान जी पर्वत सहित गिर गए। उन्होंने कहा— प्रभु राम, रक्षा करो। तब भरत जी ने उन्हें पहचान लिया। प्रभु राम से प्रार्थना कर हनुमान जी की मूर्च्छा दूर करने को कहा। हनुमान जी ठीक होते ही तत्काल पर्वत उठाकर भगवान श्रीराम के पास पहुँच गए। लक्ष्मण जी को संजीवनी बूटी पहचानकर वैद्य सुषेण ने तीन बार सूँघाया, जिससे लक्ष्मण जी स्वस्थ हो गए। लक्ष्मण जी को मूर्च्छित देखकर प्रभु श्रीराम अत्यंत व्याकुल और दुखी हो गए थे। युद्ध के लिये कुंभकर्ण भी आया, जो अहंकार का प्रतीक है। उसने कहा कि उनकी सेना अमर सेना है, तो मैं भी अमर हूँ। माँ ने मुझे आशीर्वाद दिया है। रावण ने 60 हजार की सेना युद्ध के लिये एक साथ भेज दी। हनुमान जी ने अपनी पूँछ को लंबा कर लिया और सभी को पूँछ में लपेटकर हवा में ऊपर उछाल दिया। इसका बदला लेने के लिये रावण ने भी उनकी पूँछ पकड़ ली। तत्काल हनुमान जी ने उसे भी उछालकर फेंक दिया। अंत में धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिये प्रभु श्रीराम ने रावण के सीने में अग्निबाण छोड़ा, जिससे रावण का प्राणोत्सर्ग हो गया। महाराज जी ने कहा कि प्रभु श्रीराम ने विभीषण जी से कहा कि आप अपने भाई का क्रियाकर्म एवं अंतिम संस्कार करें। तत्पश्चात विभीषण का राजतिलक करने का आदेश दिया। संत श्री ने कहा कि प्रभु श्रीराम विभीषण के साथ सीताजी एवं लक्ष्मण जी के साथ विमान में सवार होकर रामेश्वरम गए, जहाँ उन्होंने अपने द्वारा स्थापित शिवलिंग स्वरूप शंकर भगवान की पूजा-अर्चना की। इसके बाद वे भारद्वाज ऋषि के यहाँ पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने हनुमान जी को अयोध्या पहुँचने की सूचना देने को कहा। उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम जब प्रयागराज पहुँचे तो केवट मिलकर भक्तिभाव से उन्हें मिला। वह भी विमान में साथ चलने का आग्रह करने लगा। प्रभु श्रीराम उसे अपने साथ अयोध्या ले गए। उन्होंने विमान से ही अयोध्या की सात परिक्रमा की। हनुमान जी जैसे ही भरत जी को भगवान श्रीराम के अयोध्या पहुँचने की जानकारी दी, वे इतने खुश हो गए कि स्वयं अयोध्यावासियों को प्रभु श्रीराम के आगमन की सूचना देने निकल पड़े। संत श्री ने कहा कि भगवान श्रीराम विमान से उतरते ही रथ पर
सवार हो गए। अयोध्यावासी रास्ते में खड़े होकर उनका जयकारा लगाते और पुष्पवर्षा करते रहे। देवताओं ने भी प्रभु श्रीराम पर पुष्पवर्षा की। उन्होंने बताया कि प्रभु श्रीराम घर में सबसे पहले माता कैकयी से मिले और उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की। वशिष्ठ जी ने माता सीता को स्नान करने को कहा। प्रभु श्रीराम ने कहा कि आज मैं भरत जी को नहलाऊँगा, क्योंकि अब मैं राजा बन जाऊँगा, जो जनता का सेवक होता है। अंत में धूमधाम के साथ राजतिलक किया गया। कथा विश्राम के पश्चात रामकथा के मुख्य संरक्षक श्री अमर अग्रवाल ने नगर के सभी श्रद्धालुओं के प्रति आभार व्यक्त किया और मुक्त कंठ से सभी लोगों द्वारा दिए गए सहयोग के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की। कार्यक्रम के प्रारम्भ में मुख्य संरक्षक श्री अमर अग्रवाल , श्रीमती शशि अग्रवाल,श्री आदित्य अग्रवाल, श्रीमती सिमरन अग्रवाल महेश अग्रवाल , गुलशन ऋषि, गोपाल शर्मा,युगल शर्मा, महाराष्ट्र मंडल एवं वन्देमातरम मंडल आदि ने स्वागत किया कार्यक्रम के अंत में श्री अमर अग्रवाल , श्रीमती शशि अग्रवाल, बृजमोहन अग्रवाल, श्रीमती पूजा विधानी , श्री लखन लाल साहू,श्री संतोष कौशिक,श्री सुरेश गोयल आदि गणमान्य शामिल रहे।
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