बिलासपुर। राम कथा के तीसरे दिन आज माता, पिता और गुरु के महत्व पर प्रकाश डालते हुए संत श्री विजय कौशल जी महाराज ने कहा कि माता पिता और गुरु तीनों का आर्शीवाद प्राप्त करने वाले पुत्रो को किसी भी तीर्थ यात्रा पर जाने की जरूरत नहीं होती । जो पुत्र अपने आचरण, व्यवहार से माता पिता और गुरु को प्रसन्न कर लेते हैं उन्हें किसी अन्य के पास आशीर्वाद के लिए जाने की जरूरत नहीं पड़ती।
संत श्री विजय कौशल जी महाराज की कथा में दिन प्रतिदिन भीड़ उमड़ती जा रही है। लाल बहादूर शास्त्री स्कूल का मैदान श्रद्धालुओं से खचा खच भरी रहती है। सुमधुर संगीतमय कथा में रामचरित मानस की चौपाइयों को सुन श्रद्धालु आनंद से विभोर होकर झूमने लगते है। संत श्री ने कहा कि सबसे प्राथमिकता मां के चरणों में आशीर्वाद के लिए होनी चाहिए मां की हर प्रकार से सेवा करनी चाहिये। उनके कपड़े साफ करनी चाहिए पैर दबाना चाहिए मैंने स्वयं कई वर्षों तक अपनी मां की सेवा की है। स्वयं भगवान कृष्ण जी कहते हैं मैं माखन इसलिये भी चोरी करता हूं कि इसमें मेरी मां है। मां की याद कर वे भी रो पड़ते थे। मां की प्रसव पीड़ा हजारो बिच्छुओं के देश से बड़ी होती है। भगवान के प्रगट होने के पश्चात उनका नामकरण संस्कार हुआ. एक दिन भगवान जब प्रातः काल उठते है तब गुरु वशिष्ट उन्हें आश्रम ले जाते हैं। महाराज जी ने बताया कि प्रवृत्ति दो प्रकार की होती है, एक निशाचार और दूसरा राक्षसी प्रवृत्ति । निशाचर वे होते हैं जो अपना सभी कार्य अंधेरे में छिपकर या गोपनीय रूप से करतें हैं, आजकल निशाचर प्रवृत्ति सबके मन में भर गया है। उन्होंने कहा कि मौसम के अनुसार कपड़े और भोजन बदल जाते है। उन्होंने सिर ढंका कर रखते के महत्व को समझाते हुए कहा कि सिर हमेशा ढंक कर रखना चाहिये या अन्यथा कोई न कोई रोग लग जायेगा। ठंड बरसात, गर्मी तीनों मौसम में सिर ढंक कर रखना चाहिये। पहले यह परंपरा रही है।
इसीलिए महिलाओ का सिर ढंक कर रखा जाता है। बेटियां बाप का इज्जत सिर पर रखे पिता का सदैव देख कर ही सम्मान बनायें रखें। बच्चे सीखते है अतः बच्चों को सिर पर बैठा कर रखेंगे तब आप भी कुछ गलत नहीं कर पायेंगे। 7 वर्ष तक बच्चे कहलाते है, लेकिन 14 वर्ष से बच्चे बिगड़ने लगते है और 44-45 वर्ष के बाद भी यही स्थिति बहती है। इन्हें गुरु की जरूरत होती है। राम जी को जब वशिष्ट जी ले जाने लगते है तब दशरथ जी ने उनसे नहीं ले जाने की प्रार्थना की। उसी समय राम जी ने, राजगद्दी पर बैठने से पहले पूरे राज्य में पैदल भ्रमण का करने का संकल्प ले लिया। उन्होंने बताया कि राजा दशरथ जी की तीन प्रमुख रानियाँ थी पहले शादियां सम्मान के लिये की जाती थी।
संत श्री ने कथा में आगे बताया कि आश्रम में पंहुचते ही विश्वामित्र मुनि जो धनुष यज्ञ कर रहे थे कहा कि हमारे यज्ञ के पूर्ण होने तक इसकी रक्षा करनी है। गौतम ऋषि की शापित पत्नियां आश्रम आती है, तब विश्वामित्र जी राम जी से कहते है इनका उद्धार कर दो , इन पर कृपा करो। अपने चरणों से ऋषि पत्नी को स्पर्श कर श्राप मुक्त कर दिया। तत्पश्चात भगवान गंगा जी के पास गये। ऋषि जी से गंगा की महिमा सुन कर श्री राम गद्गद हो गये। गंगा जी भगवान जी की बेटी है और उनके श्री चरणों से निकली है। घुमते हुए विश्वामित्र जी को एक जगह पसंद आ गयी पता चला कि यह था राजा जनक जी का है। जनक जी को जब पता चला तो वे स्वयं विश्वामित्र जी से मिलने चले आये। दो सुंदर बालको को देखकर जनक जी ने उनका परिचय जानता चाहा तब विश्वामित्र जी ने कहा कि आप तो स्वयं ज्ञानी हैं, पहचानिए इन्हें। जनक जी उन्हें बालकों के रूप में देखकर मंत्रमुग्ध हो गए और उनकी प्रशंसा के पुल बाँध दिए। उन्होंने बताया कि ये दशरथ जी के पुत्र राम और लक्ष्मण हैं, जो मेरे धनुष यज्ञ की रक्षा करने आए हैं। उन्हें देखकर जनक जी ने उनसे राजभवन चलकर विश्राम करने को कहा। उन्होंने कहा कि लक्ष्मण जी ने राम जी से नगर देखने की इच्छा जाहिर की। शाम को वे नगर भ्रमण पर निकले। उन्हें देखते ही पूरे नगर में उन दोनों भाइयों की सुंदरता की हर गली-मोहल्ले में चर्चा होने लगी। युवतियाँ चर्चा करने लगीं—काश, इनका विवाह जानकी जी से हो जाता। वहाँ कन्याएँ उन्हें देखकर इतनी मोहित हो गईं कि स्वयं विवाह का प्रस्ताव रखने लगीं। तब राम जी ने कहा, आप लोग द्वापर तक प्रतीक्षा करें। संत श्री ने कहा कि भगवान राम और लक्ष्मण गुरु जी की पूजा के लिए जनक जी की पुष्प वाटिका में चले गए। वहाँ माली की पत्नी उन्हीं की चर्चा कर उनकी तारीफ करने में लगी हुई थी। माली कहता है कि मैंने जनक जी की सेवा की है, यदि मेरी सेवा सच्ची होगी तो वे दोनों मुझे यहीं आकर दर्शन देंगे। तभी दोनों राजकुमार वहाँ आ गए। माली उन्हें पुष्प वाटिका के अंदर आमंत्रित करता है। माली को
उन्होंने एक भरपूर सम्मान दिया। इसी बीच जानकी जी भी अपनी सहेलियों के साथ पुष्य वाटिका आ गईं। जानकी जी जब चल रही थीं, तब उनके आभूषणों की खनक भगवान को सुनाई देने लगी। भगवान भी जानकी जी को देखकर लक्ष्मण जी से कहने लगे—मेरा मन तो जानकी जी के साथ चला गया। जानकी जी माता गौरी का पूजन कर भगवान को पाने का आशीर्वाद माँगने लगीं। माता जी ने उन्हें अपना आशीर्वाद प्रदान किया। संत श्री विजय कौशल जी महाराज ने स्वयंवर की चर्चा करते हुए बताया कि इस स्वयंवर में एक-से-एक राजा-महाराज उपस्थित रहे, पर कोई भी धनुष पर प्रत्यंचा नहीं चढ़ा पाया। राजा जनक दुखी हो गए और वहाँ उपस्थित राजाओं को कोसते हुए कहने लगे—क्या आप लोगों में से कोई भी वीर नहीं है? ऐसी बात सुनकर लक्ष्मण जी का मुख गुस्से से लाल हो गया। उन्होंने भगवान राम जी से प्रार्थना की। तब भगवान राम धनुष के पास पहुँचे और अपने गुरुजनों, माता-पिता को प्रणाम करते हुए धनुष को स्पर्श किया। लक्ष्मण जी ने कहा—मैं शेषनाग का अवतार हूँ। धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाते ही पृथ्वी काँपने लगेगी, मैं अपनी शक्ति से पृथ्वी को संभाल कर रखूँगा। तभी भगवान राम ने प्रभु धनुष को पूरी शक्ति के साथ उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा दिया। वैसे ही वहाँ जय-जयकार होने लगी और जानकी जी ने भगवान राम के गले में वरमाला डाल दी।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में मुख्य संरक्षक श्री अमर अग्रवाल, श्रीमती शशि अग्रवाल, अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय बिलासपुर के कुलपति प्रोफ़ेसर ए.डी.एन. वाजपेयी श्री गुलशन ऋषि,श्री गोपाल शर्मा,युगल शर्मा, गुजराती समाज, सरयूपारी ब्राम्हण समाज, प्रजापति समाज (कुम्भकार), श्री कच्छ कड़वा समाज पाटीदार समाज,श्रीवास समाज बिलासपुर, खण्डेलवाल महिला मंडल बिलासपुर,कन्नौजिया राठौर समाज बिलासपुर,. देवांगन समाज महिला उत्थान समिति, विश्वकर्मा कल्याण समिति, पाटली पुत्र संस्कृति विकास मंच बिलासपुर ने स्वागत किया। कार्यक्रम के अंत में मुख्य संरक्षक श्री अमर अग्रवाल एवं श्रीमती शशि अग्रवाल ने आरती की।
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